
नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो यह पंक्ति उस आदर्श जीवन की झलक दिखाती है जहाँ मर्यादा, धर्म और संस्कारों का वास हो। जैसे श्रीराम की अयोध्या नगरी सच्चाई और धर्म के प्रकाश से जगमगाती थी, वैसे ही हर घर प्रेम और करुणा का केंद्र बने। इस भाव से भक्ति का एक ऐसा संसार रचता है, जिसमें परिवार और समाज दोनों ही धर्म की डोर से बंधे रहते हैं।
Nagari Ho Ayodhya Si Raghukul Sa Garana Ho
नगरी हो अयोध्या सी,
रघुकुल सा घराना हो ।
और चरण हो राघव के,
जहाँ मेरा ठिकाना हो
हौ त्याग भारत जैसा,
सीता सी नारी हो ।
और लवकुश के जैसी
संतान हमारी हो ॥
नगरी हो अयोध्या सी,
रघुकुल सा घराना हो ।
और चरण हो राघव के,
जहाँ मेरा ठिकाना हो ॥
श्रद्धा हो श्रवण जैसी,
शबरी सी भक्ति हो ।
और हनुमत के जैसी
निष्ठा और शक्ति हो ॥
नगरी हो अयोध्या सी,
रघुकुल सा घराना हो ।
और चरण हो राघव के,
जहाँ मेरा ठिकाना हो ॥
मेरी जीवन नैया हो,
प्रभु राम खेवैया हो ।
और राम कृपा की सदा
मेरे सर छय्या हो ॥
नगरी हो अयोध्या सी,
रघुकुल सा घराना हो ।
और चरण हो राघव के,
जहाँ मेरा ठिकाना हो ॥
सरयू का किनारा हो,
निर्मल जल धारा हो ।
और दरश मुझे भगवन
हर घडी तुम्हारा हो ॥
नगरी हो अयोध्या सी,
रघुकुल सा घराना हो ।
नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि यह एक संकल्प है – अपने जीवन और परिवार को राममय बनाने का। यह भजन हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने घरों को प्रेम, सत्य और मर्यादा का प्रतीक बनाएं। प्रभु राम की महिमा गाते हुए, यह भक्ति गीत हृदय को शुद्ध करता है और समाज में धर्म की ज्योति जलाने का आह्वान करता है। जो भी इस भाव में डूबता है, उसके जीवन में रामराज्य की अनुभूति होने लगती है।

