“मैनेजर साहब” की कहानी: साधारण पृष्ठभूमि से अवैध करोड़ों तक का सफर

इस पूरे नेटवर्क में सबसे अधिक जिस नाम की चर्चा है, वह है विशाल मेहरोत्रा उर्फ लालू। यह वही लालू है जिसे क्षेत्र में आजकल लोग “मैनेजर साहब” कहकर जानते हैं। लालघाट मोहल्ले का रहने वाला विशाल साधारण परिवार से आया। उसके पिता मुन्ना मेहरोत्रा ऑटो चलाकर परिवार का पेट पालते रहे। लेकिन बेटे ने सादगी से बिल्कुल अलग रास्ता चुना। कुछ ही वर्षों में वह फॉर्च्यूनर गाड़ी में घूमने लगा और एक साधारण परिवार का लड़का “मैनेजर साहब” बन गया।
पड़ोस के लोग बताते हैं कि जिस लड़के को कभी उसके पिता स्कूल छोड़ने ले जाते थे, वही लड़का अब अपराधियों और कथित पुलिस संरक्षण के सहारे करोड़ों का अवैध कारोबार चलाता है। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की भी है जहां अपराधियों को शक्ति का प्रतीक माना जाने लगता है।
कुत्तिया शैडो का सोने का हार: पैसा ताकत दिखाने का जरिया
विशाल मेहरोत्रा के पास एक कुत्तिया शैडो है। इसे पालना अपराध नहीं है, लेकिन अवैध कमाई के सहारे वह इस कुत्तिया को सोने का हार पहनाकर पूरे मोहल्ले में शक्ति का प्रदर्शन करता है। यह दृश्य सिर्फ उसके अहंकार का नहीं, बल्कि समाज की चुप्पी का भी प्रतीक है। लोग जानते हैं कि यह पैसा किस रास्ते से आया है, लेकिन कोई बोलता नहीं। अपराधी की ताकत, पुलिस की चुप्पी और समाज की मजबूरी, तीनों ने मिलकर ऐसे लोगों को चुनौतीहीन बना दिया है।
शादी में अवैध धन का खुलेआम प्रदर्शन
कुछ महीने पहले विशाल की शादी ने इलाके में खूब चर्चा बटोरी। शादी में धन का ऐसा प्रदर्शन हुआ जिसे देखकर आम लोग ही नहीं, स्थानीय अधिकारियों तक में हैरानी थी। हर कोई पूछ रहा था कि एक साधारण परिवार का लड़का इतना पैसा कहां से ला रहा है? और यदि पुलिस को यह दिख रहा था, तो उन्होंने कोई सवाल क्यों नहीं उठाया?
लोगों का कहना है कि पुलिस की सुरक्षा और संरक्षण के कारण ही लालू जैसे लोग कानून के ऊपर खुद को समझने लगते हैं। जब अपराधी का मनोबल बढ़ता है, तो समाज खुद को असहाय महसूस करने लगता है।
जीरो टॉलरेंस की नीति वाराणसी में क्यों कमजोर दिखाई दे रही है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मादक पदार्थों और अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति लागू की है। लेकिन वाराणसी में यह नीति धरातल पर कमजोर दिख रही है। यह वही शहर है जिसे सरकार ने मॉडल सिटी का दर्जा दिया। अगर इसी शहर में अवैध कफ सिरप का इतना बड़ा नेटवर्क वर्षों तक चलता रहा और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी, तो यह शासनिक ढांचे की कमजोरी का साफ संकेत है।
यह मामला सिर्फ अपराध या तस्करी का नहीं है। यह सरकार की साख पर चोट है। जब प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ऐसा नेटवर्क पकड़ा जाता है, तो संदेश पूरे देश में जाता है कि सिस्टम की पकड़ अपराध पर कितनी मजबूत है या कितनी कमजोर।
अब आगे क्या?
इस खुलासे के बाद प्रशासन ने कई गिरफ्तारियां की हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कार्रवाई सिर्फ कुछ नामों तक सीमित रहेगी या फिर पूरे तंत्र पर प्रहार होगा? क्या पुलिस की भूमिका की भी जांच होगी? क्या उन अफसरों की जवाबदेही तय होगी जिन्होंने सालों तक इस कारोबार को पनपने दिया? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वाराणसी में अपराधियों पर कानून की पकड़ सच में मजबूत होगी?
अभी शहर में डर भी है और उम्मीद भी। डर इसलिए कि नेटवर्क बड़ा था और इसकी जड़ें अभी भी कई जगहों पर हो सकती हैं। उम्मीद इसलिए कि पहली बार इतने बड़े स्तर पर कार्रवाई हुई है। लोग चाहते हैं कि यह शुरुआत भर न हो, बल्कि इसका अंत भी हो। वाराणसी जैसे शहर में अवैध नेटवर्क की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह मामला सिर्फ एक तस्करी गिरोह का खुलासा नहीं है, बल्कि यह वाराणसी की व्यवस्था, समाज और पुलिस तंत्र की परीक्षा है। यह देखना अब बाकी है कि व्यवस्था अपराध को दबाती है या अपराध व्यवस्था को।
