उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएं इस बार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। सेटेलाइट निगरानी के मुताबिक बीते 10 दिनों में घटनाओं में तीन गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खासतौर पर पूर्वांचल के जिलों में पराली जलाने के मामले तेजी से बढ़े हैं, जबकि राज्य में सबसे कम घटनाएं वाराणसी में सामने आई हैं। पर्यावरण संरक्षण के तहत केंद्र सरकार द्वारा 15 सितंबर से 30 नवंबर तक देशभर में सेटेलाइट से निगरानी की जा रही थी। इस अवधि में पूरे यूपी में ढाई महीने में कुल 7290 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गईं, जो पिछले पांच वर्षों में सर्वाधिक हैं।

पूर्वांचल में सबसे खराब हालात:
बीते दो महीनों में जहां पूर्वांचल के 10 जिलों में पराली जलाने की सिर्फ 111 घटनाएं दर्ज की गई थीं, वहीं 20 नवंबर के बाद यह संख्या तीन गुना बढ़ गई।
सेटेलाइट सर्वे में 10 दिनों में ही 327 नई घटनाएं सामने आई हैं।
- बलिया – 90 मामले
- जौनपुर – 70 मामले
- चंदौली – 23 मामले (5 साल में पहली बार दर्ज)
वाराणसी में पराली जलाने की घटनाएं पूरे प्रदेश में सबसे कम (4 मामले) रही हैं। भदोही, मिर्जापुर और सोनभद्र में भी मामलों की संख्या 1 से 4 के बीच ही रही।
क्यों बढ़े पूर्वांचल में मामले?
वाराणसी मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक शैलेंद्र कुमार ने बताया कि पूर्वांचल में धान की कटाई अपेक्षाकृत देर से होती है, जिसके कारण पराली प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ती हैं। इसी वजह से यहां 20 नवंबर के बाद मामलों में तेजी आई है।
पश्चिमी यूपी भी धधका:
20 नवंबर तक पश्चिमी और पूर्वी यूपी के कई जिलों में 100 से 800 तक मामले रिकॉर्ड किए गए थे। विशेषज्ञ इसे धान कटाई की गति, किसानों में जागरूकता की कमी और फसल अवशेष प्रबंधन उपकरणों की सीमित उपलब्धता से जोड़ रहे हैं।
कड़ी कार्रवाई और अर्थदंड:
सरकार ने सेटेलाइट से निगरानी में दर्ज मामलों पर अर्थदंड लगाने की प्रक्रिया तेज की है। पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पराली जलाने पर सख्ती बरती जाए और किसानों को विकल्प उपलब्ध कराए जाएं।
