
बनारस की सुबह हमेशा कुछ खास कहती है, और जब ठंड के साथ घना कोहरा हो तो यह एहसास और गहरा हो जाता है। आज सुबह करीब पांच बजे खजूरी से लेकर हुकुलगंज और पांडेयपुर चौराहे तक का नज़ारा ऐसा था मानो पूरा शहर सफेद धुंध की चादर में लिपट गया हो। सड़कों पर दृश्यता बेहद कम थी, सामने की चीजें धुंधली दिख रही थीं, लेकिन इसके बावजूद बनारस की रोज़मर्रा की रफ्तार थमी नहीं।

ठंडी हवाओं और कोहरे के बीच सुबह की सैर पर निकले लोग सड़कों पर दिखाई दिए। कोई तेज कदमों से चलता हुआ, तो कोई ऊनी शॉल में खुद को समेटे धीरे-धीरे आगे बढ़ता नजर आया। चौराहों और गलियों में चाय की दुकानों पर चूल्हे जल चुके थे। उबलती चाय से उठती भाप कोहरे में घुलकर एक अलग ही दृश्य रच रही थी। कुल्हड़ और कप थामे लोग हाथ सेंकते हुए बातचीत में मशगूल थे।
ऑटो, साइकिल और दोपहिया वाहन सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। हॉर्न की आवाजें कोहरे को चीरती हुई दूर तक जाती महसूस हो रही थीं। दुकानदार अपनी दुकानों की साफ-सफाई में लगे थे, मानो ठंड और कोहरा उनके लिए बस एक आम चुनौती हो।
यह बनारस की खासियत है। चाहे मौसम कितना भी सख्त क्यों न हो, यहां की ज़िंदगी कभी ठहरती नहीं। कोहरे के बीच उठती चाय की भाप, राहगीरों की कदमताल और सुबह की हलचल यही बताती है कि बनारस हर हाल में जागता रहता है, मुस्कुराता रहता है और अपनी रफ्तार बनाए रखता है।