सेन्ट्रल बार एसोसिएशन बनारस वाराणसी व दी बनारस बार एसोसिएशन वाराणसी की संयुक्त बैठक, सेन्ट्रल बार के सभागार कक्ष में साधारण सभा की असाधारण बैठक के रूप में आहूत की गई। यह बैठक प्रस्तावक राघवेन्द्र नारायण दूबे, एड० माधवेन्द्र सिंह, दीपक कुमार ‘कान्हा’, सरोज कुमार मिश्र, अकुर पटेल व एड० प्रगुनारायण सोनकर आदि के संयुक्त प्रस्ताव पर बुलाई गई।

बैठक की अध्यक्षता सेन्ट्रल बार एसोसिएशन बनारस वाराणसी के अध्यक्ष मंगलेश कुमार दुबे, एडवोकेट ने की तथा संचालन दी बनारस बार एसोसिएशन के महामंत्री श्री शशांक कुमार श्रीवास्तव ने किया। इस अवसर पर दी बनारस बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री सतीश तिवारी, एड० एवं सेन्ट्रल बार एसोसिएशन वाराणसी के महामंत्री श्री राजेश कुमार गुप्ता, एड० भी उपस्थित रहे।
सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए जनपद न्यायाधीश वाराणसी की कार्यप्रणाली पर गहरा अफसोस व्यक्त किया गया। अधिवक्ताओं ने कहा कि गिरेवांस रिड्रेसल कमेटी का गठन माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया गया है, जिसमें डी०एम०, पुलिस कप्तान, बार के अध्यक्ष, महामंत्री व सचिव सम्मिलित हैं।
बैठक में अधिवक्ता शिव प्रताप सिंह एड०, मोहित सिंह व अन्य अधिवक्ताओं पर हुए पुलिसिया उत्पीड़न व जुल्म की निंदा की गई। विशेषकर थाना मिर्जापुर के दरोगा द्वारा अधिवक्ता शिव प्रताप सिंह पर जानलेवा हमला, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल होकर ट्रॉमा सेंटर में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे, को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई।
इस घटना की जानकारी गिरेवांस रिफरेन्स कमेटी के चेयरमैन / जिलाजज को देने हेतु बार के पदाधिकारियों ने फोन पर संपर्क साधने का प्रयास किया, किंतु जनपद न्यायाधीश महोदय का सरकारी फोन स्विच ऑफ पाया गया। बाद में सूचना उनके अर्दली श्री अंबुज को दी गई, लेकिन उन्होंने भी फोन रिसीव नहीं किया।
अधिवक्ताओं का कहना था कि जिस उद्देश्य से गिरेवांस रिफरेन्स कमेटी बनाई गई थी, उसी उद्देश्य की अवहेलना हुई है। अखबारों व सोशल मीडिया के माध्यम से घटना की सूचना मिलने के बाद भी जनपद न्यायाधीश की नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि वे बार पदाधिकारियों से वार्ता कर घटना की जानकारी प्राप्त करें तथा घायल अधिवक्ता की चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित कराएं, किंतु ऐसा नहीं किया गया।
इस उपेक्षा से वाराणसी का समस्त अधिवक्ता समुदाय मर्माहत, आक्रोशित व व्यथित है। साथ ही पुलिस आयुक्त वाराणसी द्वारा संज्ञेय जानलेवा हमले के आरोपी दरोगा की अब तक गिरफ्तारी न कराना कानून की धज्जियां उड़ाना है, जिससे अधिवक्ताओं में और अधिक आक्रोश व्याप्त हो रहा है कि भविष्य में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।